पटना: बिहार में मृतजन्म (Stillbirth) के मामलों को कम करने और स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमियों की पहचान करने के लिए निगरानी और समीक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, बिहार स्वास्थ्य विभाग और यूनिसेफ की संयुक्त पहल के तहत पटना में दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।

कार्यशाला में मृतजन्म की सटीक पहचान, समय पर रिपोर्टिंग, कारणों के आधार पर मामलों का वर्गीकरण और प्रभावी समीक्षा पर जोर दिया जा रहा है। समीक्षा से सामने आने वाली कमियों को स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और रोकथाम के ठोस कदमों में बदलने पर भी चर्चा हो रही है।

क्यों जरूरी है मृतजन्म की निगरानी?

मृतजन्म सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इसकी रिपोर्टिंग और समीक्षा में कमी रहने से उन कारणों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है, जिन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और समय पर हस्तक्षेप से रोका जा सकता है।

प्रशिक्षण के जरिए गर्भावस्था के दौरान देखभाल, समय पर रेफरल और प्रसव के दौरान उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद कमियों को पहचानने पर जोर दिया जा रहा है। इससे प्राप्त आंकड़ों और समीक्षा के निष्कर्षों के आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं में जरूरी बदलाव किए जा सकेंगे।

50 से 60 स्वास्थ्य अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल

कार्यशाला के पहले दिन करीब 50 से 60 स्वास्थ्य अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल हुए। इनमें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जुड़े प्रबंधक, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, शिशु रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेजों के शिक्षक, जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और विकास क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि शामिल रहे।

कार्यशाला का उद्देश्य ऐसे मास्टर ट्रेनर तैयार करना है, जो आगे अपने-अपने जिलों में स्वास्थ्यकर्मियों को मृतजन्म की निगरानी और समीक्षा से संबंधित प्रशिक्षण दे सकें।

‘मृतजन्म के कारणों की पहचान जरूरी’

बिहार स्वास्थ्य विभाग के सचिव कुमार रवि ने कहा कि मृतजन्म आज भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण चुनौती है, जिस पर अपेक्षित ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ऐसे कारणों की पहचान जरूरी है, जिन्हें समय रहते उचित कदम उठाकर रोका जा सकता है।

उन्होंने मास्टर ट्रेनरों से अपील की कि वे कार्यशाला में मिली जानकारी को जिला और समुदाय स्तर तक पहुंचाएं। इसमें एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को भी शामिल करने पर जोर दिया गया।

मामलों की संख्या नहीं, कारणों को समझना जरूरी

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की उप आयुक्त एवं बाल स्वास्थ्य और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) की प्रभारी डॉ. शोभना गुप्ता ने वर्चुअल माध्यम से कार्यशाला को संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि मृतजन्म की निगरानी का उद्देश्य सिर्फ मामलों की संख्या दर्ज करना नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि मृतजन्म के पीछे कौन से कारण हैं और किन कारणों को समय रहते हस्तक्षेप के जरिए रोका जा सकता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि समीक्षा की प्रक्रिया किसी व्यक्ति या स्वास्थ्यकर्मी पर दोष लगाने के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से की जानी चाहिए।

MPCDSR और स्टिलबर्थ रिव्यू मॉड्यूल पर जोर

डॉ. शोभना गुप्ता ने मृतजन्म की समीक्षा में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों और शिशु रोग विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई।

उन्होंने MPCDSR (Maternal, Perinatal and Child Death Surveillance and Response) प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन स्टिलबर्थ रिव्यू मॉड्यूल के प्रभावी इस्तेमाल पर जोर दिया। इन डिजिटल माध्यमों के जरिए मामलों की समीक्षा और उनके आधार पर आगे की कार्रवाई को बेहतर बनाने का लक्ष्य है।

ICD-PM के जरिए कारणों की पहचान का प्रशिक्षण

बुधवार को हुए तकनीकी सत्रों में व्यावहारिक प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रतिभागियों को मृतजन्म से जुड़े राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों, मृतजन्म और प्रसवकालीन शिशु मृत्यु दर की मानक परिभाषाओं और उनकी गणना की जानकारी दी गई।

इसके बाद मृतजन्म के मामलों की पहचान और उनके संभावित कारणों का विश्लेषण करने का अभ्यास कराया गया। इसके लिए ICD-PM (International Classification of Diseases – Perinatal Mortality) प्रणाली के इस्तेमाल की जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण में वीडियो, केस स्टडी, व्यावहारिक अभ्यास और सामूहिक चर्चा को भी शामिल किया गया, ताकि प्रतिभागी वास्तविक मामलों की निगरानी और समीक्षा की प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझ सकें।

अंतिम दिन ऑनलाइन मॉड्यूल का लाइव प्रशिक्षण

कार्यशाला के दूसरे और अंतिम दिन MPCDSR प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन स्टिलबर्थ रिव्यू मॉड्यूल के इस्तेमाल पर चर्चा होगी। प्रतिभागियों को ऑनलाइन पोर्टल पर जानकारी दर्ज करने और मामलों की समीक्षा की प्रक्रिया का लाइव प्रशिक्षण दिया जाएगा।

इसके साथ ही मृतजन्म से प्रभावित परिवारों को भावनात्मक सहयोग और संवेदनशील देखभाल देने के तरीकों पर भी चर्चा होगी। अस्पताल और समुदाय, दोनों स्तरों पर ऐसे परिवारों की जरूरतों को समझने और उन्हें आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाएगा।