पटना: बिहार में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से विधान परिषद पहुंचने की तैयारी कर रहे नेताओं ने चुनावी संपर्क अभियान तेज कर दिया है। 23 अक्टूबर को प्रस्तावित मतदान से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है। इस अभियान में स्थानीय विधायकों, शिक्षकों और विद्यालयों से जुड़े लोगों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश के बाद एनडीए विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहने और शिक्षकों तथा विद्यालयों से जुड़े मुद्दों पर संवाद बढ़ाने का टास्क दिए जाने की बात सामने आई है। इसके तहत स्कूलों की समस्याओं को सुनने, शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाने और सरकार की उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।
स्कूलों के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति
शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में मतदाताओं की संख्या भले ही विधानसभा चुनावों के मुकाबले कम होती है, लेकिन यहां प्रत्येक मतदाता की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में राजनीतिक दल और संभावित उम्मीदवार चुनाव से पहले व्यक्तिगत संपर्क और संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत करने में जुटे हैं।
एनडीए की रणनीति में स्थानीय विधायक अहम भूमिका निभा सकते हैं। विद्यालयों से जुड़े लोगों के साथ बैठक, शिक्षकों से संवाद और स्कूलों की समस्याओं पर चर्चा के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की जा रही है।
बताया जा रहा है कि स्नातक मतदाताओं के प्रभाव वाले कुछ इलाकों में एक विधायक के संपर्क क्षेत्र में औसतन 250 से 275 विद्यालय हो सकते हैं। ऐसे में विद्यालय प्रबंधन समितियों और स्कूलों से जुड़े स्थानीय नेटवर्क को चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्कूलों की समस्याएं बन सकती हैं चुनावी संवाद का आधार
विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, भवन निर्माण, शिक्षकों की उपलब्धता, विद्यार्थियों की उपस्थिति और पढ़ाई की गुणवत्ता जैसे मुद्दे चुनाव से पहले चर्चा के केंद्र में आ सकते हैं।
इन विषयों के जरिए जनप्रतिनिधि शिक्षकों और विद्यालयों से जुड़े लोगों के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। रणनीति के तहत स्थानीय समस्याओं को समझने, सरकार के कामकाज की जानकारी देने और आवश्यक मुद्दों के समाधान के लिए पहल करने पर जोर दिया जा रहा है।
इस तरह शिक्षा व्यवस्था से जुड़े स्थानीय सवाल राजनीतिक संपर्क अभियान का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, इन प्रयासों का चुनावी परिणाम पर कितना असर पड़ेगा, यह मतदान के बाद ही स्पष्ट होगा।
शिक्षक सीटों पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि अहम
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का चुनाव सामान्य राजनीतिक चुनावों से अलग माना जाता है। यहां केवल पार्टी का समर्थन ही जीत की गारंटी नहीं होता। उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, शिक्षकों के बीच उसकी स्वीकार्यता, लगातार संपर्क और उनकी समस्याओं को लेकर सक्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
यही वजह है कि संभावित उम्मीदवार और राजनीतिक दल शिक्षकों के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। संगठनात्मक पकड़ और मतदाताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध ऐसे चुनावों में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
पिछले चुनावों में भी शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के साथ सीधे संपर्क की अहमियत सामने आती रही है। ऐसे में 23 अक्टूबर के मतदान से पहले राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदाताओं तक पहुंचने का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते।
विधायकों के लिए भी होगी चुनौती
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देशों के बाद एनडीए विधायकों की सक्रियता भी चुनावी नजरिए से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विधायकों के सामने एक ओर सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने की चुनौती है, तो दूसरी ओर शिक्षकों और विद्यालयों से जुड़े लोगों की समस्याओं को सुनकर उनका भरोसा जीतने की जरूरत है।
इस प्रक्रिया में विद्यालय प्रबंधन समितियां स्थानीय स्तर पर संवाद का माध्यम बन सकती हैं। हालांकि, इन समितियों की प्राथमिक जिम्मेदारी विद्यालयों के शैक्षणिक विकास और बेहतर प्रबंधन से जुड़ी है।
इसलिए यह जरूरी होगा कि विद्यालय प्रबंधन समितियां अपने मूल शैक्षणिक दायित्वों पर केंद्रित रहें और स्कूलों से जुड़े मुद्दों को विद्यार्थियों तथा शिक्षा व्यवस्था के हित में उठाएं। शैक्षणिक संस्थानों की गतिविधियों और राजनीतिक प्रचार के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
23 अक्टूबर के मतदान पर टिकी नजरें
बिहार में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों को लेकर चुनावी गतिविधियां तेज होने के बीच अब सबकी नजर इस बात पर है कि एनडीए की संपर्क रणनीति मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाती है।
शिक्षकों के बीच व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और मतदाताओं से सीधा संवाद इन चुनावों में अहम साबित हो सकते हैं। मतदान से पहले राजनीतिक दलों की रणनीति और उम्मीदवारों की सक्रियता आने वाले दिनों में मुकाबले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।




