गयाजी, 7 सितंबर 2026 : बिहार के गयाजी में खेती के क्षेत्र में एक नई पहल देखने को मिल रही है। जिले के मटिहानी इलाके में पहली बार दुर्लभ माने जाने वाले काला नमक राइस की बड़े पैमाने पर खेती की जा रही है। किसान बृजेंद्र चौबे करीब 18 से 20 बीघे में इस खास किस्म के चावल की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि पूरी खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूरी रखते हुए गौ आधारित जैविक पद्धति अपनाई जा रही है। इससे उपज भी अच्छी होती है।
दो साल के ट्रायल के बाद बड़े स्तर पर खेती
किसान बृजेंद्र चौबे पिछले करीब दो वर्षों से काला नमक राइस की खेती का ट्रायल कर रहे थे। प्रयोग के बाद अब उन्होंने बड़े क्षेत्र में इसकी खेती शुरू की है। खेतों में तैयार हो रही इस फसल को देखने के लिए आसपास के लोगों में भी काफी उत्सुकता है। मालूम हो कि काला नमक राइस को कई जगह Buddha Rice के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र से जोड़ी जाती है। हालांकि इसकी पैदावार सामान्य चावल की तुलना में काफी कम बताई जाती है, मगर बाजार में इसकी मांग और कीमत अपेक्षाकृत बहुत अधिक हो सकती है।
जैविक तरीके से तैयार हो रही फसल
गयाजी के किसान ने इस खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करने का दावा किया है। फसल में गोबर, गोमूत्र, छाछ, सहजन और नीम से तैयार जैविक घोल का प्रयोग किया जा रहा है। किसान का लक्ष्य पारंपरिक खेती के साथ ऐसी फसल को बढ़ावा देना है, जिसकी बाजार में अलग पहचान हो और किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके।
पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है काला नमक चावल
विशेषज्ञों के अनुसार काला नमक चावल में प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व विशेष रूप से पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे पोषण की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, डायबिटीज समेत किसी विशेष बीमारी में इसके सेवन से जुड़े दावों को बिना चिकित्सकीय सलाह के निश्चित स्वास्थ्य लाभ के रूप में नहीं लेना चाहिए। जबकि कई लोग इसे हेल्थ के लिए अच्छा बताते हैं।
बाजार में कीमत करीब 200 रुपये किलो तक
किसान के अनुसार काला नमक राइस की बाजार कीमत करीब 200 रुपये प्रति किलो तक बताई जाती है। हालांकि वास्तविक कीमत गुणवत्ता, बाजार, पैकेजिंग और बिक्री के स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसके साथ ही काला नमक चावल को GI Tag प्राप्त होने का भी दावा किया जाता है, जिससे इसकी क्षेत्रीय और पारंपरिक पहचान को बढ़ावा मिला है। गया में इस तरह की फसल की शुरुआत किसानों के लिए खेती में Diversification का एक उदाहरण बन सकती है। अगर उत्पादन और बाजार दोनों स्तर पर सफलता मिलती है, तो आने वाले समय में दूसरे किसान भी ऐसी वैकल्पिक फसलों की ओर रुख कर सकते हैं।




